बीजेपी ने संगमा का किया समर्थन जदयू ,सेना नहीं देंगे साथ

बीजेपी ने राष्ट्रपति पद के लिए पी. ए. संगमा की दावेदरी का समर्थन कर दिया है। बीजेपी नेता अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और रविशंकर प्रसाद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी घोषणा की।

सुषमा स्वारज ने कहा कि एनडीए में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर आम राय नही बन पाई। शिवसेना और जेडीयू नहीं चाहती कि एनडीए राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार उतारे। लेकिन, मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते हमने प्रत्याशी उतारने का फैसला किया है। सुषमा स्वराज ने कहा कि बीजेपी ने पी.ए. संगमा की उम्मीदवारी का समर्थन करने का फैसला किया है। अकाली दल हमारे फैसले के साथ है यानी वह भी संगमा का समर्थन करेगा।

कांग्रेस पर निशाना साधते हुए सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने कहा कि सत्ताधारी यूपीए गठबंधन ने आम सहमति बनने की कोशिश नहीं की। उन्होंने कहा कि पहले कांग्रेस ने प्रणव मुखर्जी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया और उसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हमसे समर्थन मांगा। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा ने बताया कि प्रधानमंत्री के फोन के जवाब में लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि आपने हमसे पहले राय नहीं ली और अब केवल सूचित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यूपीए के रवैये और प्रमुख विपक्षी पार्टी होने के नाते बीजेपी ने संगमा को समर्थन देना का फैसला किया है।

अरुण जेटली ने कहा कि शिवसेना और जेडीयू का इस मामले हमसे अलग रुख रखने का एनडीए गठबंधन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हालांकि, उन्होंने उम्मीद जताई कि जेडीयू और शिवसेना अपने फैसले पर पुनर्विचार करेंगी और संगमा का समर्थन करेंगी।

गौरतलब है कि संगमा की दावेदारी का सबसे पहले एआईएडीएमके और बीजू जनता दल ने समर्थन किया था। इसके बाद से ही वह मैदान में अड़े हैं। उन्होंने अपनी पार्टी एनसीपी से भी इस्तीफा दे दिया है। इस तरह संगमा को अब तक बीजेपी, अकाली दल, बीजेडी और एआईएडीएमके का समर्थन हासिल है। अगर यही स्थिति रहती है, तो उन्हें 28% के करीब वोट मिलेंगे। वैसे, संभावना है कि कांग्रेस से नाराज ममता भी संगमा को समर्थन कर दें और तब उनका वोट पर्सेंट बढ़कर 32 के करीब हो जाएगा।

माफी मांगे अल्वी………

कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी के बयान से आहत समाजवादी पार्टी ने उनपर पलटवार किया है। पार्टी नेता रामगोपाल यादव ने कहा है कि अल्वी की दिमागी हालत ठीक नहीं है, वह पगला गए हैं। अल्वी ने समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि वह बीजेपी के एजेंट हैं और उसी के इशारे पर नाचते हैं। बाद में मामला जब तूल पकड़ने लगा तब कांग्रेस पार्टी ने खुद को इस बयान से अलग कर लिया।। सपा नेता शाहिद सिद्दीकी ने राशिद अल्वी के बयान गैर जिम्मेदाराना बताया है।

सपा ने कहा है कि या तो अल्वी अपने दिए बयान पर माफी मांगे नहीं तो कांग्रेस  इस पर अपना स्पष्टीकरण दे। उन्होंने कहा कि अल्वी के इस बेतुके बयान से राष्ट्रपति पद के लिए सपा के समर्थन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हालांकि सपा ने कांग्रेस पार्टी से राशिद अल्वी के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है।

भाजपा-जदयू गठबंधन टूट की कगार पर……………

नई दिल्ली। सेक्युलर प्रधानमंत्री के मुद्दे पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान से बिफरी जदयू ने नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा से गठबंधन तोड़ने तक की धमकी दे डाली है। जदयू प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने मोहन भागवत के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि यदि 2009 के लोकसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन बिना मोदी के चुनाव में गई होती तो अभी केंद्र में एनडीए की सरकार होती। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि यदि भाजपा प्रधानमंत्री के भावी उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी को उतारती है तो जदयू राजग गठबंधन से अलग हो जाएगी।
 तिवारी ने कहा कि जदयू का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन है। जदयू भाजपा की सबसे पुराना सहयोगी है और अटल बिहारी वाजपेयी के समय यह फैसला हो गया था कि धर्मनिरपेक्ष लोगों को साथ लिए बिना सरकार चलाना संभव नहीं है। अब यदि भाजपा धर्मनिरपेक्षता को ताक पर रखना चाहती है तो यह जदयू को मंजूर नहीं है। धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर जदयू समझौता नहीं कर सकती है चाहे वह राजग गठबंधन में रहे या न रहे।
 मोदी की धर्म निरपेक्षता पर सवाल उठाते हुए तिवारी ने कहा कि वे गोधरा भूले नहीं हैं जब अटल बिहारी वाजपेयी ने भी नरेंद्र मोदी को राजधर्म की सलाह दी थी। जदयू-भाजपा गठबंधन की बिहार में एक साथ सरकार चला रही है।

सीबीआई के चाबुक ने यादव को किया मुलायम !

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली । बुधवार 13 जून को त्रणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी के साथ संयुक्त पत्रवार्ता कर

मुलायम सिंह यादव ने कठोर होने का दिखावा कर अचानक ही नाम के अनुरूप मुलायम हो जाना सियासी

गलियारों में आश्चर्य का विषय माना जा रहा है। 13 जून के बाद अचानक यू टर्न लेकर मुलायम आखिर

कांग्रेस की गोद में जाकर कैसे बैठ गए इस बारे में अब शोध किया जा रहा है।

बताया जाता है कि जैसे ही मुलायम सिंह यादव ने ममता बनर्जी के साथ मिलकर अपने उम्मीदवार के

बारे में पत्रवार्ता में खुलासा किया वैसे ही कांग्रेस के ट्रबल शूटर्स एकाएक सक्रिय हो गए। कहा जा रहा

है कि मुलायम सिंह यादव के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो में लंबित शिकायतों की नस्तियों पर से धूल की

गर्त हटा दी गई। फाईलें झाड पोंछ कर साफ कर आला अफसरान की टेबिल पर एक बार फिर सज गईं।

मुलायम के करीबी सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के दूतों ने मुलायम के साथ महामहिम के चुनाव के बारे

में चर्चा के दर्मयान सीबीआई की लंबित जांचों का हवाला भी दिया। इस पर मुलायम सिंह यादव भड़क

गए और उन्होंने कांग्रेस के दूतों को दो टूक शब्दों में कह दिया कि कांग्रेस को जो करना है कर ले, वे अब

इन धमकियों से डरने वाले नहीं हैं।

सूत्रों ने आगे कहा कि बात बिगड़ती देख एक बार फिर इन दूतों ने कांग्रेस अध्यक्ष के सबसे विश्वस्त

और राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल को फोन कर सारी चर्चा की जानकारी दी। सूत्रों की मानें तो

अहमद पटेल द्वारा ब्रम्हास्त्र चलाने की बात कहकर उन दूतों को फिर से मुलायम सिंह यादव से चर्चा

जारी रखने को कहा।

इस चर्चा के दौरान कांग्रेस के दूतों ने मुलायम सिंह यादव को एक तरफ तो सीबीआई का भय बताया गया

वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के लिए केंद्र सरकार के एक खास पैकेज के साथ ही साथ ममता के सरकार

से अलग होने के बाद उन्हें कैबनेट मंत्री का लाईलप्पा भी दे दिया गया। इस सबके लिए महामहिम चुनाव

तक मुलायम को कहा गया कि वे कांग्रेस का साथ दें।

सूत्रों ने बताया कि सारी स्थिति परिस्थिति को भांपकर सीबीआई की चाबुक से बचने और उत्तर प्रदेश

की खस्ताहाल माली हालत में सरकार चलाने की परेशानियों आदि पर विचार कर मुलायम सिंह यादव ने

इस मामले में यूटर्न लेने का भरोसा कांग्रेस के प्रबंधकों को जता दिया।

सूत्रों के अनुसार जब इस बात की जानकारी ममता बनर्जी को लगी तो वे मुलायम सिंह यादव से काफी

खफा बताई जा रही हैं। उधर, कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि अगर महामहिम के चुनाव के लिए ममता

हां कह देती हैं तो कांग्रेस को मुलायम का साथ छोड़ने में देर नहीं लगेगी, क्योंकि अगर मुलायम और

ममता की तुलना की जाए तो ममता बनर्जी कांग्रेस के लिए मुलायम से कम नुकसानदेह साबित हुई हैं।

बहुत जल्दी में हैं नरेंद्र मोदी ………………..

विधानसभा पूर्व ही होना चाहते हैं पीएम इन वेटिंग

(शरद खरे)

नई दिल्ली । भाजपा को अपनी शर्तों पर नाच नचाने वाले गुजरात के निजाम नरेंद्र मोदी बहुत ही

जल्दबाजी में दिख रहे हैं। मोदी चाह रहे हैं कि गुजरात विधानसभा चुनावों के पूर्व ही उन्हें राजग का पीएम

इन वेटिंग घोषित कर दिया जाए। मोदी चाहते हैं कि गुजरात का चुनाव भी वे आम चुनावों के मुद्दे पर

ही लड़ें ताकि उनकी छवि को अच्छी तरह से प्रोजेक्ट किया जा सके। उधर, संघ और भाजपा इस बारे में

विमर्श कर रहे हैं कि अगला कदम क्या उठाया जाए?

नरेंद्र मोदी के इर्द गिर्द से छन छन कर बाहर आ रही चर्चाओं पर अगर यकीन किया जाए तो मोदी भले

ही भाजपा संगठन को झुकाने का माद्दा रखते हों पर उन्हें सबसे ज्यादा खतरा इस वक्त लोकसभा में नेता

प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राज्य सभा के अरूण जेतली से नजर आ रहा है। यही कारण है कि मोदी चाह

रहे हैं कि तत्काल ही पार्टी उन्हें अगला पीएम प्रोजेक्ट कर दे।

उधर, दिल्ली में झंडेवालान स्थित संघ मुख्यालय ‘केशव कुंज‘ में चल रही बयार के अनुसार इस बारे में

विमर्श होना अभी बाकी है। संघ ने इस बावत भाजपा को अभी कोई लाईन नहीं दी है। यही कारण है भाजपा

भी इस मसले पर शांत ही बैठी है। माना जा रहा है कि सितम्बर में होने वाली भाजपा की नेशनल काउंसिल

की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हो।

भाजपा के अंदरखाने में चल रही चर्चाओें के अनुसार भाजपा नेतृत्व अभी इस उहापोह में ही है कि क्या

अगला चुनाव किसी चेहरे को आगे कर लड़ा जाए या नहीं? अगर चेहरा सामने किया जाए तो वह चेहरा कौन

हो? दरअसल, इस चर्चा के जनक भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी ही बताए जा रहे हैं, जिन्हें शंका है कि

अगर किसी का चेहरा आगे किया गया तो उनकी बिसात महज पार्टी अध्यक्ष की ही रह जाएगी। इसके

साथ ही साथ इस बात पर भी विमर्श होना बाकी है कि क्या नरेंद्र मोदी का चेहरा राजग के घटक दलों को

स्वीकार्य होगा?

इतिहास पर अगर नजर डाली जाए तो साफ होता है कि पार्टी ने सदा ही किसी ना किसी का चेहरा सामने

कर चुनाव लड़ा है पर वह चेहरा कभी भी पार्टी के नेशनल प्रेजीडेंट का नहीं रहा है। ज्ञातव्य है कि जिस

वक्त भाजपा ने अटल बिहारी बाजपेयी को प्रोजेक्ट किया था तब पार्टी के अध्यक्ष एल.के.आड़वाणी

थे।

इसके उपरांत 2009 में जब एल.के.आड़वाणी का चेहरा आगे किया गया था उस वक्त पार्टी की नेशनल

प्रेजीडेंट की आसनी पर राजनाथ सिंह विराजमान थे। इन दोनों ही उदहारणों से साफ हो जाता है कि इस

बार अगर किसी का चेहरा सामने कर पार्टी चुनावों में उतरती है तो इसमें नितिन गड़करी का चेहरा सामने

लाने के लिए पार्टी को पुरानी परंपराओं को तोड़ना होगा।

इसके साथ ही साथ एक बात पर और गौर करें तो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की आसनी पर बैठे

व्यक्ति को ही अगले बार पीएम का स्वाभाविक दावेदार समझा जाता है। पिछली मर्तबा जब आड़वाणी

को प्रोजेक्ट किया गया था उस वक्त अटल बिहारी बाजपेयी एनडीए के साथ ही साथ संसदीय दल के

अध्यक्ष थे। वर्तमान में नेता प्रतिपक्ष के पद पर सुषमा स्वराज विराजमान हैं।

सुषमा भी मन मारकर ही रह रहीं होंगी क्योंकि आड़वाणी के दावा छोड़ने के उपरांत ही वे अपना दावा करने

की स्थिति में आ सकती हैं। उधर, जेतली भी अंदर ही अंदर अपने लिए आधार पुख्ता करने में जुट चुके

बताए जा रहे हैं। सारे समीकरणों को देख सुनकर ही संभवतः नरेंद्र मोदी बहुत जल्दी में नजर आ रहे हैं

और वे चहते हैं कि उनको जल्द से जल्द भाजपा प्रोजेक्ट कर दे ताकि बाकी मामलों पर मट्टी डाल दी

जाए।

राजीव के पुरजोर विरोधी रहे हैं प्रणव मुखर्जी!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली !  कांग्रेस के उमर दराज नेता प्रणव मुखर्जी के नाम पर राजमाता श्रीमति सोनिया

गांधी ने पहली बार हामी भरी है। महामहिम राष्ट्रपति पद के लिए संप्रग के साझा उम्मीदवार के बतौर

प्रणव मुखर्जी का जीतना लगभग तय माना जा रहा है, किन्तु कांग्रेस में अंदर ही अंदर प्रणव मुखर्जी

की मुखालफत आरंभ हो गई है। दरअसल, प्रणव मुखर्जी को राजीव गांधी का विरोधी माना जाता है।

संभवतः यही कारण है कि प्रणव मुखर्जी को प्रधानमंत्री का पद नसीब नहीं हो पाया है। राजीव का

विरोध कर प्रणव ने समाजवादी कांग्रेस का गठन किया था, तब से वे समाजवादी ही कहलाने लगे थे। कहा

जा रहा है कि राहुल की ताजपोशी में शूल बोने के चलते भी प्रणव को सक्रिय राजनीति से दूर किया जा रहा

है।

11 दिसंबर 1935 को वीरभूमि जिले के मिराती गांव में जन्मे प्रणव मुखर्जी विद्यासागर कालेज से

स्नातक हैं। राजनीतिक कलाबाजियां खाने के पहले प्रणव ने पत्रकारिता, अध्यापन और वकालत के पेशे

को भी अपनाया है। प्रणव मुखर्जी के राजनैतिक जीवन पर नजर डालते ही कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति

सोनिया गांधी के पति राजीव गांधी के मुखर विरोधी के बतौर प्रणव का नाम सामने आ जाता है।

प्रणव पहली मर्तबा 1969 में राज्यसभा के लिए चुने गए। इसके उपरांत 1975, 1981, 1993 और 1999

में भी वे पिछले दरवाजे यानी राज्य सभा से ही संसदीय सौंध में पहुंचे। प्रणव ने अपने जीवन में महज दो

यानी 2004 और 2009 में जंगीपुर से लोकसभा चुनाव जीता है। वे केंद्र में विभिन्न मंत्रालयों को संभाल

चुके हैं।

प्रणव मुखर्जी का अशुभ अंक माने जाने वाले 13 से अनोखा नाता है। वे 13 वें राष्ट्रपति बनने के

लिए मैदान में उतरे हैं। दिल्ली में तालकटोरा रोड़ पर उनके बंग्ले का नंबर 13 ही है, कहा जाता है कि

अंधविश्वासी प्रणव छोटा होने के बाद भी इस बंग्ले को छोड़ना नहीं चाहते हैं। उनकी शादी की सालगिरह

भी 13 तारीख हो होने के साथ ही साथ 13 जून को ही ममता बनर्जी ने उनका नाम सियासी फिजां में

उछाला था।

प्रणव मुखर्जी के साथ विवादों का भी गजब का नाता रहा है। कांग्रेस के सुनील गावस्कर और सचिन

तेंदुलकर की अघोषित उपाधि पा चुके प्रणव मुखर्जी कम विवादित नहीं हैं। उनके उपर नेहरू गांधी परिवार

की चौथी पीढ़ी यानी राजीव गांधी का विरोध करने का तमगा लगा हुआ है। कांग्रेस के सूत्रों का कहना है

कि जब भी प्रणव मुखर्जी का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे लाया जाता, उनके विरोधियों द्वारा राजीव

विरोधी होने की बात कहकर उनकी उम्मीदवारी की हवा निकाल दी जाती।

गौरतलब है कि कांग्रेस के धुरंधर और दिग्गज नेता प्रणव मुखर्जी ने 1984 में इंदिरा गांधी की मौत

के बाद पार्टी को छोड़ भी दिया था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके पुत्र राजीव गांधी की सरकार में

प्रणब मुखर्जी को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया था। इससे नाराज प्रणब मुखर्जी ने 1986

में कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस नाम के अपने दल का गठन किया था। लेकिन पीवी

नरसिंहा राव ने उन्हें 1989 में योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेसी मुख्यधारा में शामिल कर

लिया था। इस तरह प्रणव पर समाजवादी होने का ठप्पा लगा गया है।

कांग्रेस की राजनीति को नजदीक से जानने से वाले यह कहते हैं कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रणब

मुखर्जी खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। लेकिन गांधी परिवार को प्रणब की यह इच्छा रास नहीं

आई और दोनों के बीच दूरी बन गई। इसी मनमुटाव का नतीजा 1986 में तब देखने को मिला जब प्रणब

ने अपनी पार्टी बनाई। कहा जाता है कि सोनिया प्रणब पर पूरा भरोसा कभी नहीं करती हैं। राजनीति

के गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि इसी भरोसे की कमी की वजह से सोनिया गांधी ने 2004 में

प्रणब मुखर्जी की जगह मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था। प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत

ने भी मीडिया से बात करते हुए कहा है कि उनके पिता 1984 से ही प्रधानमंत्री बनना चाह रहे थे। लेकिन

अभिजीत के लिए उनके पिता अब भी पीएम यानी प्रणब मुखर्जी हैं।

प्रणव पर आपतकाल के दौरान ज्यादतियां करने का आरोप लगा था। प्रणव मुखर्जी दरअसल,

इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी कैबिनेट के सदस्य रहे थे। प्रणव पर इमरजेंसी के दौरान पुलिस केस

भी दर्ज किए गए। बाद में इंदिरा गांधी ने सत्ता में लौटते ही केस वापस लिए। प्रणव पर लगे आरोपों में

तस्लीमा नसरीन को दिल्ली में नजरबंद करवाने में शामिल होने का भी आरोप है। मार्च 2008 में तस्लीमा

को देश से वापस भेजा। इसके लिए प्रणब को आलोचना का सामना करना पड़ा था।

कांग्रेस के सूत्रों का मानना है कि प्रणव मुखर्जी की राह में शूल बोने का काम गृह मंत्री पलनिअप्पम

चिदम्बरम ने बाखूबी किया है। ज्ञातव्य है कि 2011 में 2जी मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र

लिखा। पत्र में उन्होंने लिखा था कि पी. चिदंबरम चाहते तो 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला रोका जा सकता था।

2011 में उनके कार्यालय सहित वित्त मंत्रालय के महत्वपूर्ण कमरों में जासूसी का खुलासा हुआ था।

हालांकि जांच में कुछ नहीं मिला। लेकिन बीजेपी के कुछ नेताओं का दावा है कि चिदंबरम ने प्रणब मुखर्जी

के दफ्तर में जासूसी करवाई थी। हालांकि, इस आरोप की आज तक किसी भी स्तर पर पुष्टि नहीं हुई है।

उधर, राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के हक में बढ़ते सियासी समर्थन के बावजूद

एनसीपी नेता पीए संगमा मैदान छोड़ने को राजी नहीं है। अपनी पार्टी और गठबंधन की इच्छा के विरुद्ध

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष संगमा चुनाव लड़ने पर अड़े हैं। संप्रग की ओर से प्रणब की उम्मीदवारी के

ऐलान के बाद मीडिया से मुखातिब संगमा ने कहा कि वो आदिवासी समाज के प्रतिनिधि के तौर पर

राष्ट्रपति चुनाव में उतरे हैं। लिहाजा मैदान से हटने का सवाल नहीं है। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल

कलाम के चुनाव मैदान में उतरने की संभावना के बारे में पूछे जाने पर संगमा का कहना था, कि इससे

उनकी दावेदारी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। वे हर हाल में चुनाव लड़ूंगे। माना जा रहा है कि अगर संगमा

मैदान से नहीं हटते हैं तो इसका खामियाजा उनकी मंत्री पुत्री अगाथा पर पड़ने की संभावना है।

गौरतलब है कि तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता अपनी पार्टी अन्नाद्रमुक और उड़ीसा के

मुख्यमंत्री नवीन पटनायक बीजेडी की ओर से संगमा की उम्मीदवारी को समर्थन जाहिर कर चुके

हैं। हालांकि संगमा की पार्टी एनसीपी ही उनकी उम्मीदवारी के हक में नहीं है। पार्टी महासचिव डीपी.

त्रिपाठी के मुताबिक एनसीपी ने संगमा को यह स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी यूपीए के साझा उम्मीदवार

का समर्थन कर रही है।

प्रणव मुखर्जी पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की इतनी मेहरबानी की वजहें कांग्रेस के अंदरखाने

में खोजी जा रही हैं। सोनिया गांधी की किचिन कैबनेट के एक सदस्य ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर

कहा कि चूंकि प्रणव खुद प्रधानमंत्री नहीं बन पाए थे इसलिए वे अब राहुल गांधी के मार्ग में शूल बोने

का काम कर रहे हैं। यही कारण है कि अहमद पटेल के कहने पर सोनिया गांधी द्वारा प्रणव मुखर्जी को

देश के सर्वोच्च पद पर बिठाकर सक्रिय राजनीति से प्रथक किया गया है।

अल्पसंख्यकों के प्रति पुलिस के पूर्वाग्रह साफ झलकते हैं

कल्याण में पिछले (मई 2012) माह भिलाल शेख नामक एक मुस्लिम युवक पर गैर-जमानती धाराओं के तहत अपराध दर्ज कर लिया गया। सड़क पर लाल सिग्नल को पार करने के छोटे से अपराध के लिए उस पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 333 के अंतर्गत मुकदमा कायम किया गया। पुलिसकर्मियों से बहस करने पर उसकी जमकर पिटाई की गई। उसके दाहिने हाथ की हड्डी टूट गई और उसे आठ दिन जेल में बिताने पड़े। जिन पुलिसकर्मियों ने उसकी पिटाई की थी उन पर मामूली धाराएं लगाईं गईं और वे बहुत जल्द जेल से बाहर आ गए।
मोहम्मद आमिर खान जब 18 वर्ष का था और अपनी स्कूल की परीक्षा की तैयारी में व्यस्त था तब उसे पुलिस ने उसके घर से उठा लिया। उस पर आरोप था कि वह दिल्ली श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों का मास्टरमाईंड था। उस पर दर्जनों धाराओं के तहत मुकदमें लाद दिए गए। वह 14 साल तक जेल में रहा, जिस दौरान उसे घोर शारीरिक यंत्रणा भोगनी पड़ी। अंततः, वह सन् 2012 में जेल से बाहर आ सका जब अदालत ने उसे निर्दोष घोषित कर बरी कर दिया।
मालेगांव और हैदाराबाद की मक्का मस्जिद में हुए बम धमाकों-जिनके लिए बाद में असीमानंद, प्रज्ञा सिंह ठाकुर एण्ड कंपनी को जिम्मेदार पाया गया-के बाद दर्जनों मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया। अजमेर और समझौता एक्सप्रेस धमाकों के बाद भी यही हुआ। इन सभी मामलों में मुस्लिम युवकों को पुलिस को बाद में छोड़ना पड़ा क्योंकि उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं थे। परंतु उनकी जेल यात्रा ने उनका जीवन बर्बाद कर दिया। कईयों की पढ़ाई बीच में ही छूट गई और उनका एक अच्छा कैरियर बनाने का स्वप्न ध्वस्त हो गया।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईसिंज, मुंबई द्वारा किए गए सर्वेक्षण की हालिया (जून 2012) जारी रपट में कहा गया है कि महाराष्ट्र की जेलों में बंद कैदियों में मुसलमानों का प्रतिशत 36 है जबकि महाराष्ट्र की कुल आबादी का वे मात्र 10.60 प्रतिशत हैं। यह सर्वेक्षण “महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोग“ द्वारा प्रायोजित  था। यह रपट, सच्चर समिति के निष्कर्षों की पुष्टि करती है और इससे साफ हो जाता है कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा इस बाबद समय-समय पर व्यक्त की जाती रहीं आशंकाएं निर्मूल नहीं हैं।
हर अपराध के सिलसिले में मुसलमानों की बड़ी संख्या में गिरफ्तारी के पीछे है यह मान्यता कि मुसलमान अपराधी और आतंकवादी हैं। मुसलमानों के संबंध में ये पूर्वाग्रह समाज में तो व्याप्त हैं ही, नौकरशाही, पुलिस और गुप्तचर सेवाओं के अधिकारी भी इन पूर्वाग्रहों से गहरे तक ग्रस्त हैं। अधिकांश पुलिसकर्मियों की सोच घोर साम्प्रदायिक है और इसलिए वे मुसलमानों को प्रताड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। समाज के साम्प्रदायिकीकरण और विशेषकर अल्कायदा ब्रांड आतंकवाद के उदय के बाद, मुसलमानों के संबंध में पूर्वाग्रह और गहरे हुए हैं। यहां यह महत्वपूर्ण है कि अल्कायदा आतंकवाद का जनक अमरीका था जिसने तेल के कुओं पर कब्जा करने के अपने राजनैतिक लक्ष्य की पूर्ति के लिए इन तत्वों को प्रोत्साहन और मदद दी। हमारे देश का तंत्र काफी हद तक अल्पसंख्यक-विरोधी है और इसके कारण उसकी कार्यप्रणाली में तार्किकता और वस्तुपरकता का अभाव है। कानून की बजाए पूर्वाग्रह हमारे अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के पथप्रदर्शक बन गए हैं।
राज्यतंत्र द्वारा मुस्लिम युवकों को निशाना बनाए जाने के कई कारण हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि घोर निर्धनता के कारण कुछ मुस्लिम युवक अपराध की दुनिया में दाखिल हो जाते हैं और इसका फल वे भोगते भी हैं परंतु मुसलमानों को जिस बड़ी संख्या में पुलिस के हाथों प्रताड़ना झेलनी पड़ती है उसके पीछे हैं उनके बारे में फैलाए गए मिथक।
साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में हमेशा से बहुसंख्यकवादी साम्प्रदायिक ताकतों की प्रमुख भूमिका रही है। विभिन्न दंगा आयोगों की जांच रपटों के तीस्ता सीतलवाड द्वारा किए गए अध्ययन (कम्यूनलिज्म काम्बेट, मार्च 1998) बताता है कि अधिकतर दंगों को भड़काने के लिए आरएसएस से जुड़े संगठन उत्तरदायी थे। इनमें से कुछ ऐसे थे जो पूर्व से ही अस्तित्व में थे और कुछ का गठन विषेष रूप से दंगा भड़काने के लिए किया गया था। मुंबई में सन् 1992-93 के दंगों के लिए श्रीकृष्ण जांच आयोग ने मुख्यतः शिवसेना को दोषी ठहराया था। यद्यपि मुसलमानों का देश की आबादी में प्रतिशत 13.4 है (जनगणना 2001) तथापि दंगों में मारे जाने वालों में से नब्बे प्रतिषत मुसलमान होते हैं। पुलिस और कई बार राजनैतिक नेतृत्व के व्यवहार और दृष्टिकोण से मुसलमानों में असुरक्षा का भाव उपजता है।
इस संबंध में सबसे व्यथित करने वाली बात यह है कि आमतौर पर यह माना जाता है कि मुसलमान ही दंगे शुरू करते हैं। डाक्टर व्ही. एन. राय, जिन्होंने देश में साम्प्रदायिक हिंसा का विशद अध्ययन किया  है, का मत है कि अधिकांशतः ऐसी परिस्थितियां बना दी जाती हैं जिनके चलते अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को पहला पत्थर फेंकने पर मजबूर होना पड़ता है। इसके बाद, वे हिंसा के शिकार तो होते ही हैं उन्हें हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार भी कर लिया जाता है।
पिछले कुछ सालों में हुए आतंकी हमलों और उनके संबंध में पुलिस का दृष्टिकोण इस तथ्य की पुष्टि करता है। मालेगांव, अजमेर, जयपुर व समझौता एक्सप्रेस धमाकों के लिए मुस्लिम युवकों को दोषी ठहराकर उन्हें सलाखों के पीछे धकेल दिया गया था। पुलिस ने उनके विरूद्ध झूठे सुबूत गढ़ लिए थे और उनका संबंध पाकिस्तानी आतंकी गुटों से जोड़ दिया गया था। इस मामले में सिमी, पुलिस का पसंदीदा संगठन था। हर आतंकी हमले के लिए सिमी कार्यकर्ताओं को दोषी ठहरा दिया जाता था। उस समय भी कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्यों ने यह आशंका व्यक्त की थी कि पुलिस की जांच प्रक्रिया और उसके निष्कर्ष ठीक नहीं हैं परंतु पुलिस हर बम धमाके के बाद मुसलमानों को गिरफ्तार करने से बाज नहीं आई। उन्हें लश्कर-ए-तैय्यबा, इंडियन मुजाहीदीन, सिमी या किसी अन्य संगठन का सदस्य बताकर आतंकी हमलों का दोष उनके सिर मढ़ दिया जाना आम था। उस समय कई सामाजिक संगठनों ने परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से यह कहा था कि इन हमलों के पीछे किन्हीं दूसरी ताकतों का हाथ होने के संकेत हैं। परंतु पूर्वाग्रहों का चश्मा पहने पुलिसकर्मियों को कुछ नजर नहीं आया।
यह सिलसिला तब बंद हुआ जब हेमन्त करकरे ने सूक्ष्म जांच के बाद, मालेगांव धमाकों के तार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर से जुड़े होने के पक्के सुबूत खोज निकाले। इसके बाद स्वामी दयानंद पाण्डे, ले. कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित, पूर्व मेजर उपाध्याय, स्वामी असीमानंद व अन्य कई हिन्दुत्ववादी नेताओं का ऐसा गुट सामने आया जो आतंकी हमले करवाता रहा था। तब जाकर यह साफ हुआ कि पुलिस एकदम उल्टी दिशा में काम कर रही थी। इस पर्दाफाश के बाद मानवाधिकार संगठन “अनहद“ ने “बलि के बकरे और पवित्र गायें“ नामक जनसुनवाई का हैदराबाद में आयोजन किया। इस सुनवाई की रपट में जांच एजेन्सियों और राज्य की कुत्सित भूमिका सामने आई। भगवा आतंकी संगठनों के मुखियाओं की गिरफ्तारी के बाद देश में बम धमाकों का सिलसिला थम गया।
इसके बाद भी पुलिस के दृष्टिकोण में कोई विषेष बदलाव नहीं आया है और आज भी सड़कों और थानों में उनके व्यवहार में अल्पसंख्यकों के प्रति उनके पूर्वाग्रह साफ झलकते हैं। राज्यतंत्र, पुलिस और गुप्तचर एजेन्सियों के पूर्वाग्रहग्रस्त दृष्टिकोण के कारण कई मुसलमान युवकों के जीवन और कैरियर  बर्बाद हो गए हैं। इससे अल्पसंख्यक समुदाय की प्रगति बाधित हुई है। कई मौकों पर मुसलमानों ने ही आतंकी हमलों के लिए दोषी ठहराए गए अपने समुदाय के सदस्यों का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार किया। इससे उन मासूमों के दिलों पर क्या गुजरी होगी, यह समझना मुश्किल नहीं है। अब समय आ गया है कि मानवाधिकार संगठन, मासूम मुस्लिम युवकों को जबरन आपराधिक मामलों में फंसाए जाने के खिलाफ मज़बूत अभियान चलाएं। पुलिस की मनमानी पर रोक ज़रूरी है। यह जरूरी है कि पुलिस और गुप्तचर एजेन्सियां मुसलमानों के संबंध में अपनी गलत धारणाएं त्यागें और अपना काम निष्पक्षता से करें। जितनी जल्दी सरकार इस मामले में प्रभावी कदम उठाएगी, उतना ही बेहतर होगा।

मुसलमानों को कानून के हाथों प्रताड़ित होने से बचाने के अतिरिक्त उनके विरूद्ध समाज में फैले मिथकों से मुकाबला भी बहुत ज़रूरी है। ऐतिहासिक और समकालीन मुद्दों को लेकर मुसलमानों के खिलाफ जमकर दुष्प्रचार किया जाता रहा है। इस दुष्प्रचार का प्रभावी मुकाबला होना चाहिए और सच को समाज के सामने लाया जाना चाहिए। सरकार के साथ-साथ सामाजिक संगठनों का भी यह कर्तव्य है कि वे व्याख्यानों, कार्यशालाओं, छोटी-छोटी पुस्तिकाओं और मीडिया के जरिए इस मुद्दे पर जनजागृति अभियान चलाएं। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद: अमरीश हरदेनिया) 

राम पुनियानी

राम पुनियानी(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

यूपी में सत्ता का नकाब बदल गया पर एटीएस नहीं बदली

ऐसे फांसाती है एटीएस


राजीव यादव


उसे आज भी एटीएस का फोन आता है। यह सिलसिला पिछले चार-पांच महीनों से चल रहा है। वो मानता है कि उसके पूरे परिवार की तबाही का कारण भी एटीएस है। पर जब कभी आतंकवाद के आरोप में बंद उसके परिजनों से उसके परिवार की बात करायी जाती है या एटीएस वाले बुलाकर मिलाते हैं तो एक संतोष भी होता है कि इसके अलांवा और कोई चारा भी नहीं है ‘शायद अल्ला को यही मंजूर है।’ बूढ़े पिता मोहम्मद यूसुफ की निगाहों में अपने बच्चों की खुशहाली लौट आने के सपने जहां हैं वहीं जैनब को अब भी याद है कि बशीर रोज सुबह-शाम बाहर से पानी लेकर आते थे, जब वे गर्भवती थीं। और वे कह उठती हैं कि मैं कैसे मानूं की उन्होंने कुछ किया वो रोज पानी लाते थे सुबह-शाम, तब जाकर खाना पकता था। कानून की भाषा में यह सबूत नहीं टिकता पर जैनब की नजरों में यह बशीर की बेगुनाही का सबसे बड़ा सुबूत है। इस भूचाल में जैनब का पांच महीने का बच्चा जहां गर्भ में ही दम तोड़ दिया तो वहीं जैनब के भाई इशहाक की पत्नी के गर्भ में पल रहा दो महीने के बच्चे को भी यह दुनिया
मयस्सर नहीं हुयी।
अब इशहाक ही वो कड़ी है जो एटीएस की इस पूरे आतंकी जाल पर खुद एक सवाल है। उसे एटीएस की एक-एक बातें और नम्बर याद हैं जिनसे उसके मोबाइल पर बात की गयी। उसने इसे यूपी के नये मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी सुपुर्द किया है। उसे अखिलेश पर पूरा भरोसा है और यह कहने पर की उसके एक भाई की गिरफ्तारी तो सपा कार्यकाल में हुई, पर वो कहता है कि सरकार ने आतंकवाद के नाम पर जेलों में बंद बेगुनाहों को छोड़ने का वादा किया है। 5 फरवरी 2012 को इशहाक के बहनोई बशीर हसन की और 12 मई को भाई शकील को एटीएस आतंकवाद के आरोप में उठा चुकी है। इशहाक ही इस पूरी कहानी के आखिरी सुबूत और गवाह है जो फिलहाल सलाखों के बाहर हैं उनके कुछ अनुभवों और बातों से इस पूरे फसाने को आगे बढ़ाते हैं।
इशहाक बताते हैं कि पांच फरवरी 2012 को जब उनके बहनोई बशीर हसन अपने तीन साल के बेटे मुसन्ना, जो की काफी बीमार था, को दवा के लिए अपने आवास वांगरमउ जिला उन्नाव से संडीला जिला हरदोई जा रहे थे उसी दरम्यान उन्हें एटीएस ने उठा लिया। “इसके बाद लखनउ एटीएस के साहब नेे मोबाइल नम्बर 09792103104 से मेरे मोबाइल नम्बर 08948044829 पर मुझे फोन किया और मेरा पता पूछा। दूसरे दिन 9 बजे ही एटीएस का तनवीर मेरे आफिस नदवा कालेज आ गया। आते ही उसने अपने साहब को फोन कर इत्तला दी की मैं उसके साथ हूं और उनसे मेरी बात कराई। उन्होंने बशीर के बारे में जो भी पूछा उसे मैंने उन्हें बता दिया। उन्होंने कहा कि अगर आप हमारा सहयोग करेंगे तो हम भी आपका सहयोग करेंगे। फिर मैंने उनसे कहा कि मेरी बहन जैनब जो बंागरमउ में अकेली है, साथ में दो छोटे-छोटे बच्चे हैं वहां वो परेशान है क्या मैं उसे अपने घर लखनउ ला सकता हूं? तो उन्होंने कहा कि अभी उसे वहीं रहने दो, बाद में कहा कि मैं अपने ‘आदमियों को भेज दूंगा’ साथ में जाकर लेे आना।”
यहीं से एटीएस का इस परिवार के साथ जो ‘रिश्ता’ कायम हुआ उसने इस पूरे परिवार को एक तबाही और आतंक में जीने को मजबूर कर दिया है। जो इस पूरे बदले परिदृश्य को एक कुदरती कहर के रुप में स्वीकार करने लगा जो दरअसल उनके खिलाफ उन्हीं के हाथों की जा रही एक घातक साजिश का भ्रूण था। जिसके जख्म इस परिवार के चेहरे पर अब साफ देखे जा सकते हैं। इस परिवार द्वारा किसी भी तरह का प्रतिरोध न होने पर एटीएस ने अपने लिए हरी झण्डी मान ली। फिर क्या था एटीएस का तनवीर दो बजे दोपहर के करीब गाड़ी लेकर आया और इशहाक को लेकर वांगरमउ गया। इशहाक बताते हैं कि वहां पहुंचकर एटीएस ने आस-पास के लोगों और बशीर के मकान मालिक से कहा कि तुम लोग भी कहीं जाना नहीं और जब भी लखनऊ बुलाया जाएगा तो तुम लोगों को आना पड़ेगा। इशहाक अपनी बहन और बच्चों को लेकर वहां से निकला तो एटीएस ने गाड़ी का रास्ता गोमती नगर अपने आॅफिस की तरफ मोड़ दिया। वहां इशहाक और जैनब से लंबी पूछताछ की गई। जब रात के वक्त जैनब के छोटे-छोटे बच्चे रोने-बिलखने से परेशान हो गए तब जाकर एटीएस वालों ने उन्हें छोड़ा। वहीं पर एटीएस के एक अधिकारी जिसे वहां के लोग साहब कहते थे के बारे में इशहाक बताता है कि भाई शकील से पूछताछ करने के लिए फोन बाहर के पीसीओ से करने के लिए कहा और साथ ही कहा कि कह दो वो मेरे पास आ जाए और अपना मोबाइल बंद कर ले। किसी से कोई बात न करें।
एटीएस द्वारा पीसीओ से फोन करवाना यह पुष्ट करता है कि वो यह पूछताछ गैरकानूनी तरीके से अपराधियों की तरह कर रही थी। और हर उस सबूत से बचने की कोशिश कर रही थी जिससे वो कहीं नक्शे में न दिखे जिसे आम बोलचाल की भाषा में गोपनीयता कहा जाता है। अब इशहाक के सामने सही वक्त का इंतजार करने के अलांवा कुछ भी नहीं दिख रहा था।
बहरहाल, इशहाक बताते हैं कि 8 फरवरी 2012 को शकील जब मेरे पास नदवा आए तो एटीएस का तनवीर उनसे आकर मिला और दोपहर तक बातचीत करता रहा। उसके बाद करीब 3 बजे एटीएस शकील को अपने आफिस ले गयी और फिर रात में ही उन्हे छोड़ा। फिर क्या था यह एक सिलसिला बन गया और हर आहट के साथ एटीएस की आहट इस पूरे परिवार को सुनाई देने लगी। दूसरे दिन यानी 9 फरवरी को एटीएस फिर आ धमकी। शकील और जैनब को लेकर फिर गयी और बच्चों के ज्यादा रोने पर जैनब को नदवा वापस छोड़ दिया। शकील को फिर रात तक पूछताछ के नाम पर आतंकित करने का काम अपराधी एटीएस करने लगी। एक हफ्ते से ज्यादा वक्त तक यह सिलसिला चलता रहा। जब माने तब एटीएस फोन करती या पूछताछ के नाम पर उठा ले जाती। शकील, जैनब समेत पूरा परिवार मानसिक बीमारी की
चपेट में आ गया। बच्चे बुरी तरह से बीमार हो गए और जैनब के पांच महीने के बच्चे का गर्भपात हो गया। इशहाक यह बताते हुए सदमें में चले जाते हैं क्योंकि जिंदगी के इस दुरुह रास्ते पर उनके पूरे परिवार के अन्दर हर बात को छुपाने का जो दबाव उन पर था इस मानसिक हालात और बार-बार इशहाक से पूछताछ के सिलसिले से
उनकी पत्नी की मानसिक स्थिति काफी खराब हो गई थी। उनके पेट में पल रहा दो महीने का बच्चा इस दुनिया में आने से पहले ही रुखसत हो गया। लखनऊ के हयात
नर्सिंग होम में बहन जैनब और पत्नी दोनों को इलाज के लिए भर्ती कराया।
हाथ पर हाथ धरे बैठे इशहाक को यह नहीं मालूम था कि उनके लिए एक नई मुसीबत की कब्र एटीएस खोद रही है। एटीएस का सिलसिला नहीं रुका और एटीएस के तनवीर के आने के साथ ही हर बार कोई नई मुसीबत इस परिवार के सामने खड़ी हो जाती। इशहाक बताते हैं कि शकील पर तनवीर का दबाव बढ़ता ही जा रहा था। वो बार-बार कहता कि मैं जैसा बताऊं वैसे चलकर तुम आॅफिस में कहना वरना तुम भी अन्दर हो जाओगे। शकील पर घर से न निकलने का और मोबाइल बंद रखने का दबाव लगातार एटीएस वाले बनाए रहते थे। वे कहते थे कि हमें कुछ पूछना होगा तो हम खुद आकर या तुम्हारे भाई इशहाक के जरिए बात कर लेंगे।
इस पूरी परिघटना में लखनऊ एटीएस ने शकील को प्रायोजित तरीके से समाज से काट दिया और छुपकर रहने की आड़ में उसे अपने आतंकी जाल में फसाने की पूरी पुलिसिया पटकथा लिखनी शुरु कर दी। एटीएस के कहने पर ही शकील लखनऊ में अपने साढू मुशीर अहमद जो दुबग्गा में रहते हैं के यहां अपनी बीबी साइमा खातून और 3 साल की बेटी उम्म-ए-ऐमन के साथ रहने लगा। इस बीच जो भी पूछताछ लखनऊ एटीएस को करनी होती इशहाक के मोबाइल नम्बर 08948044829 पर बात करते या नदवा कालेज आते या नदवा के बाहर बुलाते।
इसी बीच इशहाक के इसी मोबाइल पर दिल्ली पुलिस का फोन आया कि वो बशीर से आकर मिल ले और उसके कपड़े लेता आए। इस बात से परेशान इशहाक ने लखनऊ एटीएस के साहब से कहा कि क्या करुं एक तो आप लोग बराबर पूछताछ कर रहें हैं और अब दिल्ली वाले फोन कर रहे हैं। इस पर उस एटीएस के अधिकारी ने कहा कि दिल्ली मत जाना नहीं ंतो वे तुम लोगों को पकड़ लेंगे। इस भंवर जाल ने इशहाक को दिमागी रुप से पैदल कर दिया और हर उस बात के लिए जिससे उसे असुरक्षाबोध होता उसके लिए लखनऊ एटीएस के ऊपर निर्भर रहने लगा कि वो क्या कहते हैं।
इस बीच यूपी के विधानसभा चुनावों के दौरान लखनऊ एटीएस वाले इशहाक के गांव कुतुबपुर, बिस्वा सीतापुर गए। गांव में उन्होंने बताया कि वे इशहाक और शकील के
दोस्त हैं, उनसे जमीन लेने के बारे में कुछ बात हुई थी इधर चुनावों की ड्यूटी में आए तो सोचा कि मिल लें। गांव वालों से घंटों पूछताछ की। इशहाक बताते हैं कि एटीएस वालों का क्या था वे बार-बार गांव जाते और सड़क पर पान की दुकान वाले से भी फोन पर हम लोगों के आने-जाने की पूछताछ करते। कई बार देर रात में किसी अनजान व्यक्ति को भेंजते जो हमारे घर का चक्कर काट कर चला जाता। इस पूरी परिघटना में एटीएस ने परिवार के अन्दर हर स्तर पर डर पैदा करने के साथ ही गांव वालों के साथ उनके सम्बन्धों को तोड़ने की हर सम्भव कोशिश की।
सत्ता का नकाब बदल गया पर एटीएस नहीं बदली यानि की यूपी में बसपा से सपा पूर्ण बहुमत में आ गई और मंचों और मीडिया में मुस्लिम वोटों को इस जीत की वजह मुलायम ने माना पर बेगुनाहों पर सियासत का चाबुक वही पुराना था।
इशहाक बताते हैं कि वो 4 मई की तारिख थी जब तनवीर ने मोबाइल नम्बर 09792103153 से फोन किया कि गेट (नदवा कालेज, लखनऊ) पर आ जाओ कुछ जरुरी बात करनी है। मैं गया तो उन्होंने कहा कि एक बार फिर तुम सबको आफिस बुलाया जाएगा। तनवीर के ऐसा कहते ही इशहाक को नई मुसीबत आने का अंदाजा हो गया।
5 मई को एटीएस का तनवीर इशहाक के घर आया और कहा कि बशीर से मिलने दिल्ली जाना चाहो तो साहब से बात कर लो, मैंने बशीर के पत्र के बारे में बताया कि उसने कपड़े मंगाये हैं, तो साहब ने कहा कि अब कोई खतरा नहीं है कह दो जाकर मिल ले हम अपना आदमी भेज देते है। एटीएस लखनऊ ने 10 मई को लखनऊ मेल से रात 10 बजे इशहाक को चलने के लिए कहा, पर छुट्टी न मिलने की बात कह वो जाने से इन्कार कर दिया।
इशहाक का एटीएस को किया इन्कार उसके ऊपर कहर बन के टूट पड़ा। एटीएस लखनऊ ने 7 मई को इशहाक से शकील का नया नम्बर लिया, और उससे नदवा कालेज के भटकली लड़कों की लिस्ट और कुछ के फोटो मांगे। इशहाक बताते हैं कि 9 मई को दिन में कई बार फोन करके इस काम के लिए शकील पर एटीएस ने दबाव बनाया, पर उसने कहा कि यह काम मेेरे बस से बाहर है। 11 तारीख को एक आदमी के जरिए लखनऊ एटीएस ने मुझे फोन न0 7275265518 पर फोन करवाया कि तुम लोग होशियार रहना।
आगे इशहाक कहते हैं कि 12 मई को 9 बजे तनवीर को फोन किया कि क्या बात है? तो तनवीर ने कहा कि पीसीओ से बात करो तो मैंने दूसरे नम्बर 7388923992 से बात की तो उन्होंने शकील के बारे में पूछा कि वह कहां है? मैंने बताया कि दुबग्गा में  अपने साढू के घर पर है। इस वक्त पढ़ाने गया होगा, तो तनवीर ने कहा कि पता कर
लो। फिर मैंने शकील को फोन किया तो उसका मोबाइल बंद था। जब शाम तक घर नहीं पहुंचा तो मैंने फिर तनवीर को फोन किया तो उनहोंने कहा कि पहले बता दिया था कि होशियार रहना और बताया कि दिल्ली एटीएस वाले ले गए हैं। फिर मैंने एटीएस के साहब को फोन किया और शकील के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि हमें नहीं
मालूम है। मैंने तनवीर की बात का हवाला दिया तो उन्होंने कहा कि दिल्ली वाले ले गये होंगे।
इशहाक ने इस आफत की घड़ी में अपनी सफाई देते हुए ‘एटीएस के साहब’ से कहा कि फरवरी में जब आपने उसे बुलवाया था तो वह फौरन आपके पास हाजिर हो गया था, और आप ने उससे पूरी इनक्वाइरी कर ली थी, और तीन महीने से आप के सम्पर्क में था, अगर वह मुजरिम था तो आपने उस वक्त उसे क्यों नहीं पकड़ा? और अब आप ने दिल्ली वालों के हवाले कर दिया। आपके लोग ही उसको पहचानते थे और आपके पास ही उसका नम्बर था, तो उन्होंने कहा कि हमें उसकी कोई जरुरत नहीं थी, दिल्ली वालों को रही होगी इसलिए वो ले गए। लखनऊ आओ तो बात करेंगे, और फोन काट दिया।
जब हम इशहाक के घर से निकल रहे थे तो उनके बूढ़े पिता मोहम्मद यूसुफ अपने मुंह को मेरे कान पर लाते हुए कहते हैं कि इशहाक कह रहा था कि आप लोग मदद करेंगे तो वो छूट जाएंगे, कब तक वो छूट जाएंगे? और उनकी आंखों में आंसू आ गए जिसे वे दिन की रोशनी में छुपाने का हर संभव प्रयास करने लगे।

राजीव कुमार यादव,

राजीव कुमार यादव, लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। लेखक राज्य प्रायोजित आतंकवाद के विशेषज्ञ हैं।

ऐसे शासक को जूते क्यों न मारा जाये ?

नवल किशोर कुमार

https://i2.wp.com/www.apnabihar.org/index_files/image7251.jpg

बात बहुत सीधी है। ब्रेन फ़ीवर यानी दिमागी बुखार की वजह से बच्चे बीमार हो रहे हैं और इलाज के अभाव में वे दम तोड़ रहे हैं। पिछले 26 दिनों में अबतक 203 बच्चों के मरने की सूचना मिली है।

सबसे अधिक बच्चे मुजफ़्फ़रपुर और गया जिले में मरे हैं। पिछले वर्ष भी इन्हीं दो जिलों में इस अज्ञात बीमारी ने बड़ी संख्या में बच्चों की जान ली थी।

इस वर्ष बच्चों की मौत का सिलसिला पिछले 26 दिनों से जारी है। बिहार का शासक अब जागा है। जागने के बाद उसने कहा है कि अब जो बच्चा मरेगा, उसके परिजन को 50 हजार रुपये की सहायता राशि दी जायेगी। यह राशि शासक के अपने कोष यानी मुख्यमंत्री राहत कोष से दी जायेगी। शासक को अब यह होश आया है कि हर जिले में एक कंट्रोल रुम स्थापित करने, डाक्टरों की टीम गांव-गांव भेजने, मैलाथियोन का छिड़काव कराने और इंसेफ़लाटिस से बचाने के लिए बच्चों को टीका लगाये जायें।

जबकि पिछले वर्ष भी बिहार की जनता को याद होगा कि इसी शासक ने इन्हीं बातों को कहा था। इसके लिए केंद्र द्वारा संपोषित राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना के तहत राशि भी प्रदान की गयी। लेकिन क्या हुआ पिछले एक साल में। इंसेफ़लाइटिस के कारण बच्चों के मरने का सिलसिला समाप्त हुआ तो सरकार भूल गयी और स्वास्थ्य योजनाओं को ठंढे बस्ते में डाल दिया गया। नतीजा इस साल फ़िर सामने आ रहा है।

सवाल यह है कि क्या यह संभव नहीं है कि समय रहते बच्चों के जीवन को बचाया जाय? एक सवाल यह भी कि जो शासक मासूम बच्चों के जीवन के साथ ऐसा घिनौना खिलवाड़ करे और बच्चों के मरने के बाद उसके परिजनों को 50 हजार रुपये का लोभ दे, वैसे शासक को जूते क्यों न मारे जायें?

नरक के द्वारपाल बने नितीश………….

(प्रतिभा सिंह)

पटन । इनसेफ्लाइटिस से मरनेवाले बच्चों के परिजनों को 50-50 हजार रुपये की सहायता राशि दी

जायेगी। यह राशि मुख्यमंत्री सहायता कोष से परिजनों को मिलेगी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य

में इनसेफ्लाइटिस से हो रही मौत की मंगलवार को उच्चस्तरीय समीक्षा की। बच्चों के इस तरह काल के

गाल में समाने से नितीश कुमार का कुशासन सामने आ रहा है।

बताया जाता है कि बीमारी का अध्ययन के लिए शीघ्र ही केंद्रीय टीम बिहार आयेगी। मुख्यमंत्री ने इस

संबंध में केंद्रीय सचिव से मंगलवार को फोन पर बात की। बैठक में मुख्यमंत्री ने गांव में डॉक्टरों की

टीम भेज कर ऐसे रोगियों की पहचान करने का निर्देश दिया। इस तरह के मरीजों को अस्पताल में लाकर

इलाज सुनिश्चित कराने का भी आदेश दिया गया।

यह व्यवस्था की गयी है कि आंगनबाड़ी सेविकाओं से बीमार हो रहे बच्चों की मदद करने में सहायता ली

जाये। समीक्षा बैठक में उन्होंने स्वास्थ्य विभाग को पटना, मुजफ्फरपुर व गया जिलों में अलग-अलग

टास्क फोर्स गठित करने का निर्देश दिया। फोर्स की जिम्मेवारी होगी कि प्रतिदिन इनसेफ्लाइटिस से

पीड़ित रोगियों की पहचान के लिए की गयी कार्रवाई व इलाज के लिए की गयी कार्रवाइयों की समीक्षा

करे। टीम विशेषज्ञों से भी संपर्क रखे और उनसे परामर्श लेकर बेहतर चिकित्सा सुविधा पीड़ित बच्चों

को उपलब्ध कराये।

मुख्यमंत्री ने केंद्र केंद्र से वैक्सिन की मांग की। केंद्रीय सचिव ने मुख्यमंत्री को आश्वासन दिया कि

केंद्रीय टीम बिहार भेजा जायेगा। पीड़ित बच्चों के इलाज एवं बीमारी से बचाव के लिए हर संभव सहायता

उपलब्ध करायी जायेगी। विशेषज्ञों ने मच्छर काटने से होनेवाली बीमारी मस्तिष्क ज्वर बताया है।

इसके लिए मच्छर मारने के लिए बड़े पैमाने पर मेलाथियोन के छिड़काव का निर्देश भी दिया गया। बड़े

पैमाने पर बचाव के लिए टीकाकरण अभियान भी चलाया जायेगा।

मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि जिला स्तर पर सिविल सर्जन के नियंत्रण में शिकायत निवारण केंद्र

की स्थापना की जाये। इस कंट्रोल रूम के दूरभाष नंबरों को प्रचारित किया जाये जिससे कि मस्तिष्क

ज्वर से पीड़ित लोगों के संबंध में समय पर सूचना उपलब्ध हो सके और उन्हें इलाज की सुविधा तुरंत

मुहैया करायी जा सके।